अलंकार किसे कहते हैं – अलंकार की परिभाषा, प्रकार, भेद और उदाहरण।

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अलंकार की परिभाषा (Alankar Ki Paribhasha)

लंकार किसे कहते हैं: काव्य के सौंदर्य को बढ़ाने वाले तत्त्व अलंकार कहलाते हैं। “अलंक्रियते इति अलंकार” अर्थात् जो अलंकृत अथवा भूषित करे वही अलंकार है। जिस तरह आभूषण मनुष्य की शोभा को बहुगुणित करते हैं उसी प्रकार अलंकार भी काव्य के सौंदर्य को बढ़ाते हैं।

अलंकार का शाब्दिक अर्थ तो आभूषण ही लिया जाता है। वैसे अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना शब्द है –

अलम् + कार (जिसमें अलम् का अर्थ आभूषण या शोभित/भूषित तथा कार का अर्थ है करना) ।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि काव्य जगत के आभूषण को अर्थात काव्य में शोभा बढ़ाने वाले तत्त्व को कहते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार – “भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं के रूप, गुण और क्रिया का अधिक तीव्र अनुभव कराने में कभी कभी सहायक होने वाली उक्ति अलंकार है। “

आचार्य दंडी ने अलंकार शब्द को परिभाषित करते हुए लिखा कि – “काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म को अलंकार कहते हैं  ➜ ‘काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारन् प्रचक्षते। ‘

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अलंकार के भेद (Alankar Ke Bhed)

अलंकार मुख्यतः तीन प्रकार के माने जाते हैं –

  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार
  3. उभयालंकार।

इनके अतिरिक्त विचारकों ने अलंकार के भेदों में रसालंकार, भावालंकार, मिश्रालंकार आदि को भी शामिल किया है।

1.शब्दालंकार

जब अलंकार का चमत्कार शब्द में निहित होता है तब वहाँ शब्दालंकार होता है। यहाँ शब्द का पर्याय अर्थात समानार्थक रखने पर चमत्कार खत्म हो जाता है। शब्दालंकार में मुख्यतः 7 अलंकारों को शामिल किया जाता है जो कि हैं –

  1. अनुप्रास
  2. यमक
  3. श्लेष
  4. वक्रोक्ति
  5. पुनरुक्ति प्रकाश
  6. पुनरुक्ति वदाभास
  7. वीप्सा आदि।

a.अनुप्रास अलंकार

‘अनु’ यानि बार-बार + ‘प्रास’ यानि वर्ण। अर्थात जहाँ वाक्य में समान वर्णों की आवृति या बारम्बारता एक से अधिक बार हो यानि वर्ण दो या दो से अधिक बार आये तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। वर्णों की आवृति में स्वरों का समान होना आवश्यक नहीं हैं।

चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में।

अनुप्रास के भेद – 
  1. छेकानुप्रास अलंकार
  2. वृत्यानुप्रास अलंकार
  3. लाटानुप्रास अलंकार
  4. अन्त्यानुप्रास अलंकार
  5. श्रुत्यानुप्रास अलंकार

b.यमक अलंकार

यमक शब्द का अर्थ होता है – दो। जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आये लेकिन उसका अर्थ भिन्न भिन्न हो, तब वहां यमक अलंकार होता है।

कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाये बौराए नर, वा पाये बौराये।।

यमक के भेद – 
  1. सभंग पद यमक
  2. अभंग पद यमक

c.श्लेष अलंकार

श्लेष (शिलष् + यण) का शाब्दिक अर्थ होता है चिपकना (एक ही शब्द में अनेक अर्थों का चिपका होना) अर्थात जब कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हुआ हो लेकिन उसके अलग अलग अर्थ निकाले जा सकें, तब वहां श्लेष अलंकार होता है।

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गए न उबरै मोती मानस चून।।

श्लेष के भेद –
शब्दालंकार के आधार पर ➜
  1. सभंग श्लेष
  2. अभंग श्लेष
उभयालंकार के आधार पर ➜
  1. शब्द श्लेष
  2. अर्थ श्लेष

d.वक्रोक्ति अलंकार

वक्रोक्ति अर्थात वक्र + उक्ति, जहाँ वक्र का अर्थ उल्टा/टेढ़ा और उक्ति का अर्थ कथन है। जब वक्ता द्वारा उक्त कथन का श्रोता ‘श्लेष’ या ‘काकु’ द्वारा भिन्न अर्थ कल्पित कर लेता है, वहां वक्रोक्ति अलंकार होता है।

को तुम हो ? इत आये कहां ?
घनश्याम हो, तो कितहूँ बरसौ।
चितचोर कहावत है हम तौ।
तहँ जाहु जहाँ धन है सरसौ।

वक्रोक्ति के भेद –
  1. श्लेष वक्रोक्ति
  2. काकु वक्रोक्ति

e.पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार

पुनरुक्ति (पुनः + उक्ति) अर्थात् किसी उक्ति का पुनः प्रयोग या दोहराव। जहाँ किसी शब्द की पुनरावृति होती होती है यानि कोई शब्द दोहराया जाता है लेकिन अर्थ समान ही रहता है, वहाँ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार होता है।

मधुर वचन कहि-कहि परितोषीं।

पुनरुक्ति/पुनरुक्त के भेद –
  1. पूर्ण पुनरुक्ति
  2. अपूर्ण पुन्रिक्ति
  3. अनुकरण वाचक पुनरुक्ति

f.पुनरुक्ति वदाभास अलंकार

पुनरुक्ति + वद + आभास अर्थात् पुनरुक्ति का आभास मात्र बताया जाना। जहां कथन में प्रयुक्त शब्द पुनरुक्त न हों फिर भी उनके पुनरुक्त होने का आभास हो और शब्द भिन्न-भिन्न अर्थ भी दें, वहाँ पुनरुक्ति वदाभास अलंकार होता है।

अली भौंर गुंजन लगे, होन लगे दल-पात।
जहँ-तहँ फूले रूख-तरु, प्रिय प्रीतम किमि जात।।

g.वीप्सा अलंकार 

वीप्सा का अर्थ होता है – आवृति/पुनरावृति/पुनरुक्ति। जब आदर, शोक, घृणा, आश्चर्य, हर्ष, विस्मयादिबोधक आदि भावों को प्रभावशाली रूप से व्यक्त करने के लिए शब्दों की पुनरावृति हो, तब वहाँ वीप्सा अलंकार होता है।

मोहि-मोहि मोहन को मन भयो राधामय।
राधा मन मोहि-मोहि मोहन मयी-मयी।।

2.अर्थालंकार

जब अलंकार का चमत्कार उसके शब्द के स्थान पर उसके अर्थ में निहित हो वहाँ अर्थालंकार होता है। यहाँ पर्यायवाची शब्द रखने पर भी चमत्कार बना रहता है क्योंकि चमत्कार का मूल अर्थ है ना कि शब्द। अर्थालंकारों में निम्न अलंकार सम्मिलित हैं –

  • उपमा
  • उत्प्रेक्षा
  • रूपक
  • उदाहरण
  • दृष्टांत
  • विरोधाभास
  • भ्रांतिमान/भ्रम
  • संदेह
  • अतिशयोक्ति
  • विभावना
  • विशेषोक्ति
  • अन्योक्ति/अप्रस्तुत प्रशंसा
  • प्रतीप
  • मानवीकरण
  • उल्लेख
  • स्मरण
  • दीपक
  • व्यतिरेक
  • सहोक्ति
  • विनोक्ति
  • समासोक्ति
  • आक्षेप
  • परिकर
  • परिकरांकुर
  • काव्यलिंग
  • अर्थान्तरन्यास
  • उपमेयोपमा
  • अनन्वय
  • अनुमान
  • अपह्नुति
  • तुल्ययोगिता
  • प्रतिवस्तूपमा
  • निदर्शना
  • पर्यायोक्ति
  • व्याजस्तुति/व्याज-निन्दा
  • विषम
  • असंगति
  • कारणमाला
  • एकावली
  • सार
  • यथासंख्य\क्रम
  • अर्थापत्ति
  • परिसंख्या
  • सम
  • तद्गुण
  • अतद्गुण
  • मीलित
  • उन्मीलित
  • स्वभावोक्ति
  • व्याजोक्ति/व्याज-छल या बहाना
  • लोकोक्ति

1.उपमा अलंकार

उपमा का अर्थ होता है – तुलना करना। जब किन्हीं दो वस्तुओं में रंग, रूप, गुण, स्वभाव और क्रिया आदि मापक के कारण समानता दर्शायी जाती है, तब वहाँ उपमा अलंकार होता है।

इसमें उपमेय को उपमान के समान बताया जाता है, तुलना की जाती है। इसके लिए सा, सी, से, सम, सरिस, समान आदि उपमा वाचक शब्दों को प्रयोग में लाया जाता है।

पीपर पात सरिस मन डोला।

उपमा के भेद –
  1. पूर्णोपमा
  2. लुप्तोपमा
  3. मालोपमा

2.उत्प्रेक्षा अलंकार

उत्प्रेक्षा का अर्थ होता है – उद्भावना(कल्पना) या अनुमान। जब उपमान की अनुपस्थिति में उपमेय में उपमान की बलपूर्वक संभावना व्यक्त की जाती है अर्थात उपमेय को ही उपमान मान लिया जाए या अप्रस्तुत को प्रस्तुत मान लिया जाये, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

इसमें जनु, जानो, मनु, मानो, निश्चय, प्रायः, बहुधा, इव, खलु आदि वाचक शब्द प्रयुक्त किये जाते हैं।

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
झुके कूल सो जल परसन हित मनहु सुहाए।।

उपमा के भेद –
  1. वस्तूत्प्रेक्षा
  2. हेतूत्प्रेक्षा
  3. फलोत्प्रेक्षा

3.रूपक अलंकार

जब उपमेय और उपमान में अंतर/भेद को समाप्त करके एकीकृत दर्शाया जाए, तब वहां रूपक अलंकार होता है। इसमें उपमेय में उपमान का आरोप किया जाता है।

चरन-सरोज पखार न लागा।

रूपक के भेद –
  1. सांग रूपक
  2. निरंग रूपक
  3. परंपरित रूपक
  4. सम रूपक
  5. अधिक रूपक
  6. न्यून रूपक

4.उदाहरण अलंकार 

जहां एक वाक्य कहकर दूसरा वाक्य उसके पुष्टि या उदाहरण के रूप में वाचक शब्दों (जैसे, ज्यों, जिमि, यथा आदि) को प्रयुक्त करके कहा जाये, वहां उदाहरण अलंकार होता है।

जो पावै अति उच्च पद, ताको पतन निदान।
ज्यौं तपि-तपि मध्यान्ह लौं, अस्त होत है भान।।

5.दृष्टांत अलंकार

दृष्टांत का अर्थ होता है – उदाहरण या मिसाल। जहां उपमेय और उपमान के साधारण गुणधर्म में भिन्नता होते हुए भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब की स्थिति दर्शायी जाये अथवा एक ही भाव या आशय की दो बातें कही जाती हैं जिसमें प्रथम पंक्ति या बात का प्रतिबिम्ब द्वितीय पंक्ति में झलके या द्वितीय पंक्ति प्रथम पंक्ति की पुष्टि के लिए उदाहरण या मिली-जुली बात के रूप में काम आये, वहां दृष्टांत अलंकार होता है।

यह उभयालंकार का अंग भी माना जाता है। इसमें उदाहरण अलंकार की तरह वाचक शब्दों (जैसे, ज्यों, जिमि, यथा आदि) का प्रयोग नहीं होता है।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का कर सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।

6.विरोधाभास अलंकार

विरोधाभास (विरोध + आभास) अर्थात विरोध का आभास होना। जहाँ वाक्य में वास्वितविक रोध न होने पर भी विरोध का आभास हो अथवा विपरीत शब्दों के माध्यम से सार्थक बात कही जाए अथवा दो परस्पर विरोधी तथ्यों का संयोग दर्शाया जाए, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।

या अनुरागी चित्त की गति समुझैं नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बूङै स्याम रंग त्यों-त्यों उज्जवल होय।।

7.भ्रांतिमान/भ्रम अलंकार

भ्रांतिमान का अर्थ है – भ्रमयुक्त होना। जहाँ परस्पर समानता के कारण एक वस्तु (उपमेय) में दूसरी वस्तु (उपमान) का भ्रम हो जाए, वहाँ भ्रांतिमान या भ्रम अलंकार होता है।

यह भी उभयालंकार का अंग माना जाता है।

फिरत घरन नूतन पथिक चले चकित चित भागि।
फूल्यो देख पलास वन, समुहें समुझि दवागि।।

8.संदेह अलंकार

जहाँ उपमेय में उपमान के संशय का आभास हो अर्थात जहाँ किसी वस्तु को देखकर मन में संदेह का भाव बना रहे, वहाँ संदेह अलंकार होता है।

सारी बीच नारी है या नारी बीच सारी है,
कि सारी की नारी है कि नारी की ही सारी।

9.अतिशयोक्ति अलंकार

अतिशयोक्ति (अतिशय + उक्ति) अर्थात बहुत अधिक  + कही गयी बात। जहाँ किसी विषय-वस्तु का गुणादि का वर्णन लोकसीमा का उल्लंघन करते हुए बढ़ा-चढ़ा कर किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

देख सुदामा की दीन दशा करुणा करके करुणानिधि रोए,                                                          पानी परात को हाथ छुयो नहिं नैनन के जल सों पग धोए।

10.विभावना अलंकार

विभावना (वि + भावना) अर्थात बिना (विहीन) + मन की कल्पना। जहाँ बिना किसी कारण के कार्य के पूर्ण होने की अवस्था को दर्शाया जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है।

बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करै विधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी वक्ता बड़ जोगी।।

11.विशेषोक्ति अलंकार

विशेषोक्ति (विशेष + उक्ति) अर्थात जहाँ कारण के विद्यमान होने पर भी कार्य का सिद्ध न होना दर्शाया जाए, वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है।

यह अलंकार विभावना अलंकार के विपरीत होता है।

दो-दो मेघ बरसते मैं प्यासी की प्यासी।
नीर भरे नित प्रति रहै, तऊ न प्यास बुझाई।।

12.अन्योक्ति/अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार

अन्योक्ति (अन्य + उक्ति) अर्थात दूसरे (प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष द्वारा) + कहा गया कथन। जहाँ अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन हो अथवा किसी व्यक्ति/वस्तु विशेष को कोई बात किसी अन्य को माध्यम बनाकर कही जाए, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।

इसे अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार भी कहते हैं। इसमें सीधे या प्रत्यक्ष रूप में बात न कहकर अप्रत्यक्ष रूप में कही जाती है।

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास एहि काल।
अली कली ही सो बिंध्यौ, आगे कौन हवाल।।

13.प्रतीप अलंकार

प्रतीप का अर्थ होता है – उल्टा या विपरीत। जहाँ उपमा अलंकार के नियम (उपमेय को उपमान के समान कहना) या अंगों (उपमेय➜उपमान) के विपरीत उपमान को उपमेय के समान (उपमान➜उपमेय) कहा जाता है अथवा उपमेय को उपमान व उपमान को उपमेय के रूप में दिखाया जाता है, वहाँ प्रतीप अलंकार होता है।

अपने नाम (प्रतीप – विपरीत) की सार्थकता के अनुसार यह अलंकार उपमा अलंकार के विपरीत होता है। उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया जाता है।

1.सिय मुख समता किमि करै चंद वापुरो रंक।                                                                     

2.चन्द्रमा मुख के समान सुंदर है।

14.मानवीकरण अलंकार

मानवीकरण का अर्थ है – मनुष्य रूप देना। जहाँ जड़ व अचेतन वस्तुओं पर चेतन या मानवीय भावनाओं व क्रियाओं का आरोप करते हुए उन्हें मनुष्य अथवा चेतन की तरह व्यवहार करता हुआ दर्शाया जाए अर्थात मूर्त या अमूर्त वस्तुओं का वर्णन सजीव प्राणियों की क्रियाशीलता की भांति किया जाये, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

इसमें निर्जीव वस्तुओं का सजीव वस्तुओं की भांति वर्णन होता है।

1.फूल हँसे कलियाँ मुसकाई।                                                                         

2.कलियाँ दरवाज़े खोल खोल जब झुरमुट में मुस्काती हैं।

15.उल्लेख अलंकार

उल्लेख का अर्थ होता है – वर्णन करना। जहाँ किसी एक वस्तु का वर्णन या उल्लेख अनेक/एकाधिक रूपों में किया जाए, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है।

तू रूप है किरण में, सौंदर्य है सुमन में।
तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में।।

उल्लेख के भेद –
  1. प्रथम उल्लेख
  2. द्वितीय उल्लेख

16.स्मरण अलंकार

स्मरण का अर्थ होता है – याद या स्मृति। जहाँ किसी पूर्व परिचित व्यक्ति या वस्तु के सदृश किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु को देखकर पूर्व परिचित का ध्यान स्मृति पटल पर उद्धृत हो अर्थात वर्तमान स्थिति से अतीत की किसी घटना का पुनः स्मरण हो आये, वहाँ स्मरण अलंकार होता है।

इसे स्मृति अलंकार भी कहते हैं।

सघन कुंज छाया सुखद, सर सिज सुरभि समीर।
मन है जात अजों वहै, वा जमुना के तीर।।

17.दीपक अलंकार

जहाँ उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) दोनों का एक ही गुण/धर्म वर्णित किया जाता है, वहाँ दीपक अलंकार होता है।

1.देखें ते मन न भरै, तन की मिटै न भूख।
बिन चाखै रस न मिलै, आम, कामिनी, ऊख।।

2.रहिमन पानी रखिये, बिन पानी सब सून।                                                                        पानी गये न ऊबरे, मोती मानुस चून।।

18.व्यतिरेक अलंकार

व्यतिरेक का अर्थ होता है – समान न होने की अवस्था या एक पक्ष में आधिक्य। जहाँ उपमान की अपेक्षा अधिक गुण होने के कारण उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ/उत्कृष्ट बताया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।

इसमें अतिशयोक्ति के साथ छोटी वस्तु को बड़ी वस्तु से श्रेष्ठ बताया जाता है।

जिनके यश प्रताप के आगे।
ससि मलीन रवि सीतल लागे।।

19.सहोक्ति अलंकार

सहोक्ति (सह + उक्ति) अर्थात सहित/साथ + कहा गया कथन। जहाँ एक साथ कई बातों या कार्यों का होना वर्णित हो, वहाँ सहोक्ति अलंकार होता है।

इसमें सह, समेत, साथ, संग आदि शब्दों के द्वारा एक शब्द (कोई विशेषता या गुणधर्म) दो पक्षों में लगता है। एक पक्ष में प्रधान रूप में व एक पक्ष में अप्रधान रूप में।

1.फूलन के सँग फूलि है रोम परागन से संग लाज उड़ाइहैं।

2.जस, प्रताप, वीरता, बड़ाई,
नाक, पिनाकहिं संग सिधाई।।

20.विनोक्ति अलंकार

विनोक्ति (विना + उक्ति) अर्थात अभाव/बगैर + कही गयी बात। जहाँ उपमेय या प्रस्तुत की किसी अन्य वस्तु के अभाव में हीनता या श्रेष्ठता दर्शायी जाए अर्थात एक वस्तु के बिना दूसरी वस्तु को अशोभित वर्णित किया जाए, वहाँ विनोक्ति अलंकार होता है।

इसमें बिना, रहित व बिनु आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी।                                                                                                            तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।

21.समासोक्ति अलंकार

समासोक्ति (समास + उक्ति) अर्थात योग या मेल + कहा गया कथन। जहाँ कार्य, लिंग या विशेषण की समानता के कारण प्रस्तुत से अप्रस्तुत का बोध हो, वहाँ समासोक्ति अलंकार होता है।

कुमुदिनी हूँ प्रफुलित भई, साँझ कलानिधि जोई।

22.आक्षेप अलंकार

यहाँ आक्षेप का अर्थ है – निषेध। जहाँ इष्टार्थ को निषेध रूप में वर्णित किया जाए या किसी बात की विवक्षा की दृष्टि से उस विषय का वर्णन निषिद्ध किया जाये अर्थात किसी विवक्षित (कथनीय या इच्छित) वस्तु/कार्य को बिना पूर्ण किये ही बीच में छोड़ दिया जाए, वहाँ आक्षेप अलंकार होता है।

इसमें वास्तव में निषेध नहीं परन्तु निषेधाभास होता है।

निर्गुन कौन देस को बासी?
मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझति, साँच, न हाँसी।
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन, भेस है कैसो केहि रस कै अभिलासी।
पावैगो पुनि कियो अपनो जो रे! कहैगो गाँसी।
सुनत कौन ह्वै रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी।

आक्षेप के भेद –
  1. उक्ताक्षेप
  2. निषेधाक्षेप
  3. व्यक्ताक्षेप

23.परिकर अलंकार

जहाँ विशेष प्रयोजन से विशेषण का अभिप्राय युक्त प्रयोग हो अर्थात विशेषण साभिप्राय प्रयोग हो, वहाँ परिकर अलंकार होता है।

इसमें विशेषण के द्वारा विशेष्य का वर्णन किया जाता है।

सोच हिमालय के अधिवासी, यह लज्जा की बात हाय।
अपने ताप तपे तापों से, तू न तनिक भी शान्ति पाय।।

24.परिकरांकुर अलंकार

जहाँ क्रिया को विशेष रूप से प्रकाशित करने या महत्व देने के लिए साभिप्राय विशेष्य प्रयोग में लाया जाता है वहाँ परिकरांकुर अलंकार होता है।

1.सुनहु विनय मम विटप अशोका।
सत्य नाम करु, हर मम शोका।।

2.तब तक हर के प्रखर शरों ने त्रिपुरासुर के प्राण हरे।

25.काव्यलिंग अलंकार

जहां कोई युक्ति समर्थित बात अर्थात किसी कथित बात के प्रमाण या समर्थन में कोई युक्ति या कारण बतलाया जाए, वहाँ काव्यलिंग अलंकार होता है।

कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
उहि खाय बौरात नर, इहि पाए बौराए।।

26.अर्थातरन्यास अलंकार 

जहाँ सामान्य कथन का विशेष से और विशेष कथन का सामान्य से समर्थन किया जाए, वहाँ अर्थातरन्यास अलंकार होता है।

सामान्य से तात्पर्य जो अधिकव्यापी (बहुतों पर लागू हो) तथा विशेष से तात्पर्य अल्पव्यापी (जो कम पर लागू हो)।

जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग ।।

27.उपमेयोपमा अलंकार

जहाँ उपमेय और उपमान को परस्पर उपमान और उपमेय बनाने का यत्न किया जाता है अर्थात जहाँ उपमेय और उपमान को एक-दूसरे की उपमा दी जाती है।

1.तेरो तेज सरजा समत्थ दिनकर सो है,                                                                                    दिनकर सोहै तेरे तेज के निकरसों।

2.राम के समान शम्भु, शम्भु सैम राम है।

28.अनन्वय अलंकार 

जहाँ उपमेय की तुलना के लिए कोई उपमान न होने पर उपमेय को ही उपमान बना दिया जाता है, वहाँ अनन्वय अलंकार होता है।

यद्यपि अति आरत – मारत है,
भारत के सम भारत है।

29.अनुमान अलंकार 

अनुमान का अर्थ ही होता है – अंदाजा लगाना। जहाँ किसी कथन/तथ्य या घटना की पूर्णतया पुष्टि न हो अर्थात उसका सिर्फ अनुमान (शायद ऐसा होगा) लगाया जाए, वहाँ अनुमान अलंकार होता है।

इसमें उक्त बात की सुनिश्चितता नहीं होता है।

नाचि अचानक ही उठे, बिनु पावस बन मोर।                                                                                जानति हौं नंदित करी, यह दिसि नंदकिसोर।। 

30.अपह्नुति अलंकार

अपह्नुति का अर्थ होता है – छिपाना या निषेध करना। जहाँ उपमेय (संज्ञा) को छिपाकर या निषेध कर (ना, नहीं, न, नहिं आदि के द्वारा) उपमान (सर्वनाम) का आरोप किया जाता है अथवा सत्य बात को छिपाकर उसके स्थान पर असत्य बात स्थापित की जाये, वहाँ अपह्नुति अलंकार होता है। 

इसमें न, ना, नहीं, नहिं जैसे शब्दों का प्रयोग उपमेय को निषेध करने में किया जाता है। 

1.सुनहु नाथ रघुवीर कृपाला,
बन्धु न होय मोर यह काला।

2.नेत्र नहीं पद्म (नील कमल) हैं।

31.तुल्ययोगिता अलंकार 

जहाँ अनेक प्रस्तुतों व अप्रस्तुतों या उपमेयों व उपमानों में गुण या क्रिया के आधार पर एक ही धर्मत्व स्थापित किया जाए, उनका एक धर्म बतलाया जाए, वहाँ तुल्ययोगिता अलंकार होता है।

चन्दन, चंद, कपूर नव, सित अम्भोज तुषार।
तेरे यश के सामने, लागें मलिन अपार।।

➤ यहाँ चन्दन, चन्द्रमा, कपूर तथा श्वेत कमल व तुषार इन अप्रस्तुतों (उपमानों) का एक ही धर्म ‘मलिन लगना’ दर्शाया गया है।

32.प्रतिवस्तूपमा अलंकार

प्रतिवस्तूपमा (प्रति + वस्तु + उपमा) अर्थात प्रत्येक वाक्य में उपमा (सदृश्ता या समानता)। जहाँ अंतर्निहित समानता वाले उपमेय और उपमान वाक्यों में विभिन्न शब्दों (शब्द-भेद) द्वारा एक ही धर्म का कथन होता है अथवा जब दो वाक्यों में वस्तु-प्रति-वस्तु भाव हो, वहाँ प्रतिवस्तूपमा अलंकार होता है।

इस अलंकार में उपमेय और उपमान में समानता/सादृश दर्शाने वाला कथन स्पष्ट नहीं होता है बल्कि व्यंजित होता है। साधारण धर्म तो एक ही होता है परंतु कहने के ढंग में अंतर होता है।

तिन्हहि सुहाव न अवध-बधावा, चोरहिं चाँदनि रात न भावा।

➤ यहाँ ‘न सुहाना’ साधारण धर्म है जो उपमेय वाक्य में ‘सुहाव न’ शब्द से और उपमान वाक्य में ‘न भावा’ शब्द से व्यक्त किया गया है।

33.निदर्शना अलंकार 

जब दो वस्तुओं या दो कार्यों [भिन्न] को समानता सूचित करने के लिए बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से एक बतलाया जाये जबकि वे एक न हों (परस्पर सम्बन्ध संभव या असंभव हो), वहाँ निदर्शना अलंकार होता है।

इस अलंकार में वाक्यार्थ एक प्रकार से असंभव-सा प्रतीत होता है, परंतु उपमा की कल्पना द्वारा उसकी पूर्ति हो जाती है।

कहां अल्प मेरी मति, कहाँ काव्य मत गूढ़।
सागर तरिवो उडुप सौं, चाहत हौं मतिमूढ़ी।।

➤ यहां पर ‘काव्य ग्रंथ की रचना करना’ तथा ‘उडुप (छोटी नाव) से सागर पार करना’ इन दोनों वाक्य में समानता का संबंध दिखाया गया है जो प्रायः असंभव है, क्योंकि ग्रंथ रचना अलग कार्य है तथा सागर पार करना अलग। अतएव उपमा का सहारा लेकर इन दोनों में संबंध स्थापित हो जाता है तथा इसका अर्थ है ये हो जाता है कि ‘मुझ जैसे अल्प मति के लिए ग्रंथ लिखना उतना ही कठिन है जैसे छोटी नाव से समुद्र पार करना’।

निदर्शना के भेद –
  1. प्रथम निदर्शना 
  2. द्वितीय निदर्शना 
  3. तृतीय निदर्शना 

तथा 

  1. दो कार्य में एकत्व की स्थापना
  2. दो वस्मेंतुओं में एकत्व की स्थापना

34.पर्ययोक्ति अलंकार 

 

3.उभयालंकार

जहां अलंकार का चमत्कार उसके शब्द और अर्थ दोनों में पाया जाता है, वहाँ उभयालंकार होता है। श्लेष अलंकार उभयालंकार की श्रेणी में आता है।

  • शब्द के आधार पर शब्द श्लेष
  • अर्थ के आधार पर अर्थ श्लेष।

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